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Forgotten "father"

गुमनाम पिता ************************************** प्रणय के अंतरंग छण मे, प्रेम के बीज तो...! पड़े ही होंगे.., तुम्हारे ह्रदय के अन्तः मे../ अब कभी अगर .., ये भावना बन के,. उमरे...!, घुमरे...! अथवाप्रिडा दे...? तो लोक-लज्जा के भय से .., इसका गला मत घोट देना....!! तुम, इसे,....शब्द देना..., यह "गुमनाम" पिता का पुत्र होगा ..!! -प्रभाकर झा "कुरमगज़"

" छांव "

समय के धुप मे , अब तक ...तो खिल गए होंगे तुम्हारे, योवन की हर एक कालिया, कहो,.. बुलायोगे कब ?, बताने..,की महका-महका 'बदन' तुम्हारा , अब हर शाम रहता है!! मेरी अत्माना ..! कब दिखायो गे ?...की ..., तेरे गोरे -गोरे अंगों, पे.. मेरे अंगलुयो से लिखा, मेरा ही नाम होता है!! कब सीखायोगे, की ...? मचलते हुए अधर-पंखुरी को...! कितने देर तक दबायु..?? तो इसकी "जलन" शांत होता है.!! हे प्रेयसी...! कामनायो के तपिश से, सुर्ख हो उठता है .., अब,नित्य मेरा तन - बदन ! कांप -कांप जाते है, मेरे हर कदम...! बतायो, कब बुलायोगे ..? जब होगा हमारा.."महामिलन" की जानु......? देह -मन के तृष्णायो से परे..! आत्मा के अमरायो..मे ही, "प्रेम" की शीतल घनी छावं होता है.... -- सप्रेम आपका प्रभाकर झा 'कुर्मगज'