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शिव संकल्प है , सती समर्पण है !

जिस स्त्री की, प्रेम की प्रतीक्षा, पार्वती जैसी हो, समर्पण सती जैसी हो, उन्हें शिव जैसा पुरुष मिलता है ! पुरुष तुम्हे ...? तुम्हे, संकल्प  ले कर, सत्य  को खोजना है,  समाधिस्थ  होने तक, प्रकृति  स्वमेव, तुम्हें  पार्वती प्रदान करेगी !

शिवरात्री

 प्रतीक्षा भले ही अंतहीन हो, लेकिन अब भ्रम ना रहे  जब भी मिले, उन्हें उनका शिव मिले, और,  मुझे मेरी शक्ति मिले !

वक्त सा

हमारा इश्क हमसे संभला नहीं साहब ! कंबख़्त, वक्त सा बदलता गया !
जब से मिला हूँ, और अब  तक,  ये निश्चित  से जाना है, आपकी, नजरअंदाजगी। ...चल जायेगा ! नाराजगी ? ... मार जाता है   !

यात्री हूँ

में ठहर नहीं सकता। ...! शापित -सनातन यात्री हूँ,  चिर काल तक मुझे चलना है ! किसी राह - किसी मोड़ पर, हर बार मिलता  रहूँगा !

सराय

राह मिले, हमराही  बनना चाहा।  इत्फ़ाक  देखिये ...! आप सराय बन गयी, और में ? आप का साया !    -PJha

बेइन्तिहाँ

 बेइन्तिहाँ  था...! उनका  'सितम' और..., मेरा इश्क !           -PJha