" छांव "


समय के धुप मे ,
अब तक ...तो
खिल गए होंगे तुम्हारे,
योवन की हर एक कालिया,
कहो,.. बुलायोगे कब ?,
बताने..,की महका-महका 'बदन' तुम्हारा ,
अब हर शाम रहता है!!
मेरी अत्माना ..!
कब दिखायो गे ?...की ...,
तेरे गोरे -गोरे अंगों, पे..
मेरे अंगलुयो से लिखा,
मेरा ही नाम होता है!!
कब सीखायोगे, की ...?
मचलते हुए अधर-पंखुरी को...!
कितने देर तक दबायु..??
तो इसकी "जलन" शांत होता है.!!
हे प्रेयसी...!
कामनायो के तपिश से,
सुर्ख हो उठता है ..,
अब,नित्य मेरा तन - बदन !
कांप -कांप जाते है,
मेरे हर कदम...!
बतायो, कब बुलायोगे ..?
जब होगा हमारा.."महामिलन"
की जानु......?
देह -मन के तृष्णायो से परे..!
आत्मा के अमरायो..मे ही,
"प्रेम" की शीतल घनी छावं होता है....
-- सप्रेम आपका प्रभाकर झा 'कुर्मगज'

Comments

Anonymous said…
nic one sir.u really writes very good.

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I will come back !

let me go............!!chodo mujhe jane do..